....... "मेरे एहसास" .......
मेरे पास खड़ा, कुत्ता
न जाने क्या
सूंघ रहा था, ज़मीन पर कुछ
दुंद रहा था
मैंने तो कोई
रोटी का टुकड़ा नही
फेंका था कल ।
कान एकदम चुस्त
कहीं और
कुछ की तलाश मे,
आँखे एकदम बेबस,
मेरी बेबसी का
एहसास दिला रहा था ।
मुझसे नज़रे चुरा रहा था
या शायद
हमदर्दी जता रहा था
और सूखा निवाला
मेरी हमदर्दी का
मुझे ही लौटा रहा था ।
प्यार से, मैं उसे
गधा भी नही कह सका था,
क्योंकि
कुछ दिन पहले
कहने की जीबा
मैं खुद खा चुका था ।
तो भी, भूख उसे
ब्याकुल न कर सकी थी, क्योंकि
ज़मी से उसे
मिट्टी की सुगंध
जो आ रही थी, और
अनाज की बोरी
सेठ की तिजोरी में पड़ी
सड़ी जा रही थी
सड़ी जा रही थी ।
- Tilak Mengi
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